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अइसन हे आज छत्तीसगढ़ी के हाल. छत्तीसगढ़ के लइके मन नइ जानत हे साड़ही अउ करउनी काला कहिथे अउ का होथे तब छत्तीसगढ़ी बोली-भाखा के ढिंढोरा पिटइया मन बतावय के कइसे ये छत्तीसगढ़ी ला पढ़ाय अउ लिखाय जाय. पूरा जमीने हर बंजर होगे हे तब ओमा कोनो बीज हा कइसे जामही (अंकुरित होही). टीवी, अंग्रेजी अउ दुसर भाषा-भाषी के चलन इहां के लइका, सियान सबो के दिल दिमाग मं समागे हे तब छत्तीसगढ़ी तो एकर मन के पांव तरी दब के कुचरा के दम तोड़ दिही. बचे-खुचे जेकर मन के सांस चलत हे तउन मन घसीट-घसीट के लंगड़ा-लंगड़ा के रेंगत हे. ये हाल हे छत्तीसगढ़ी के. छत्तीसगढ़ी ला सजोर बनाना हे तब जमीन ला पहिली तइयार करे ला परही तब ओ काम होही, पहिली कक्षा ले छत्तीसगढ़ी ला पढ़ाये लिखाए से. बात तो शुरु होय रिहिस हे साड़ही अउ करउनी तीर ले, इस्कूल के पढ़हइया-लिखइया मन करा ले. गुरु जी कोनो गलत नइ पूछे रिहिस हे? ओ गुरू जी, जरूर गांव के होही. ओकर घर मं गाय भइस होही, दूध-दही के माड़ा होही. बने दले-मले होही साड़ही अउ करउनी तेकर सेती ओहर पूछ परिस. दुसर गुरू जी होतीस शहरिया तब ओहर अइसन पूछे के गलती कभू नइ करे रहितिस. काबर के ओकर घर मं जिहां ओहर रहिथे तिहां तो गाय भइस ला कोन काहय मुसुवा बिलई तको नइ होही. हां दुसर घर ले जरूर बिलई जात होही मुसुवा के टोह ले बर. फेर मुसुवा मन घला आजकल चतुरा होगे हे, अइसन जल्दी कोनो बिलई के चाल मं फंसइया नोहय. ओकर कदम चाप के आहट जइसे पता चलथे अपन बिला मं तुरते पहुंच जाथे, बिलई मन घला आजकल छुछुआवत हे सिकार के बिना.

अब न ओमन ला कोनो मुसुवा हाथ लगत हे न दूध अउ दही. सब नंदावत जात हे. गाय भइस अब कोनो गांव मं, घर मं रखना पसंद नइ करत हे. बड़ा लफड़ा होगे हे एला पाले पोसे के. पहिली बात तो ये हे के मवेशी भाग के ककरो खेत मं चल देथे अउ रखवार कहूं पकड़ लिस तब हकन के डांड़ (जुरमाना) देथे. डाड़ नइ देबे तब बनय नहीं. खड़ी फसल के राहत ले चरी के लफड़ा बने रहिथे. दुसर पहाटिया मन नौटंकी करे ले धर ले हे. हफ्ता मं दू दिन बरवाही मांगथे. मवेशी मालिक मन कनवाथे, हफ्ता मं दू दिन नहीं एके दिन जब बारवाही देबों कहिथे तब पहाटिया मन हाथ खड़ा कर देथे. अतके नही गाय भइस नइ चरावन कहिके बात करथे. अब करय तो करय का मवेशी मालिक मन. हताश खाके सब धीरे-धीरे बेचना शुरु कर देहें. अब अइसे दिन आगे के कखरो घर मं जिहां पहिली गाय अउ भइस के गोहड़ी राहय तउन मन सब बेच डरिन. अउ अब पहाटिया मन तीर ले दूध दही अउ मही बीसा के गुजारा करत हे. घर मं पूजा करे बर गाय नइ मिलत हे.

सबके घर सुन्ना परगे हे, सकरायत झांक दे हे तइसे लागथे. ककरो घर खोजे मं गाय, बछरू अउ बछिया नइ मिलय. अइसन दिन आगे हे. पहिली का रिहिस हे जेकर घर मं गाय,भइस राहय तेकर घर मं सुख शांति अउ परेम भरपूर राहय. गऊ ला लछमी कहिथे हमर भारतीय संस्कृति मं. जेकर घर मं आजो गऊ हे ओमन धन-धान्य अउ सबो जिनिस ले भरपूर हे, कोनो जिनिस के अपुरतिहा नइ हे. जब ले गऊ ला निकाल बाहिर करे हें तब ले घर मं दुःख, अशांति, कलह अउ पाप समागे हे. रात दिन झगरा मारपीट कलर-किलिर होवत रहिथे. दारू, मांस खात-पियत हे, पाप समागे हे. जइसे करनी तइसे भरनी. भोगत हे अपन-अपन करम के सजा. हजारों, लाखों कमावत हे फेर ककरो मन मं सुख शांति नइ हे, संतोष नइ हे, मरत कटत हे.

अब जब घर ले, गांव ले गाय भइस नंदावत जात हे तब कहां ले दूध दही पाहीं? अउ जब उही नइ हे तब कहां ले साड़ही अउ करउनी खांही लइका मन? जब ओला नइ खांही पीहीं, ओकर जगह मं कोका कोला, पिज्जा खात हे पियत हे तब कहां ले रोग राई नइ आही? सब कोती उल्टा गंगा बोहाय ले धरत हे. अब सब कला, संस्कृति, बोली-भाखा ,परब अउ परमपरा धारे-धार बोहावत हे, नंदावत जात हे तब चेत चढ़त हे के कइसे रसदा ले बे-रसदा होवत हन? तब अब पछताए का होवत हे जब खेत के सबो फसल ला चिरई मन चाटत हे. गाड़ी धपोर दे हे, टस के मस नइ होवत हे, एक पग आघू बढ़े के नांव नइ लेवत हे. अइसने होथे पर के बुध ला मान के चले मं.

कतेक सुघ्घर ओ दिन रिहिस हे जब बने घर मं गाय भइस राहय तब साड़ही अउ करउनी खाय ले मिलय. अब ओ सब सपना होगे. सोचथन ओ दिन कभू लहुट के आही ते नहीं? ओ दिन ला लाना हे तब गाय भइस अपन-अपन घर मं पाले बर परही. ये मवेशी सिरिफ मवेशी भर नोहय, मवेशी माने के गलती झन करन. ओ लछमी हे, गऊ माता हे, कामधेनु हे. ओकर रेहे ले घर मं बरकत होथे, सुख शांति अउ संतोष बिन बुलाय चले आथे.

सुरता आवत हे गांव मं रेहेन तब बहुत साड़ही अउ करउनी लुका के अउ चोरा-चोरा के खावन. दाई, काकी अउ भउजी मन दूध ला जमाय बर जब कसेली ला देखय तब साड़ही नइ पाके खिसियावय. ए दे कोन हे ते खादे हे साड़ही ला. डर के मारे बतावन नहीं. करउनी तो खाबे करन. अइसने एक दिन के बात हे खाना खाय बर बइठे रेहेन परछी मं. थोकिन दूरिहा मं कसेली मं दूध चुरत रहिथे. कोन जनी कतका बेर कोन कोती ले चंडाल कउंआ आइस अउ चोंच मार के साड़ही ला धर के भागते बनिस. मोर नजर परगे, दीदी ला केहेंव-दीदी..दीदी.. साड़ही ला लेके भागत कउंआ ह. हात हात… कहिते हन ओहर छानही मं जाके बइठगे अउ मजा मारत खाय लगिस. रसखान कवि के ये पंक्ति “काग के भाग बड़े सजनी हरि हाथ सो ले गयो माखन रोटी” सुरता आगे. मोला टाइटिल मिलगे लिखे बर ओ दिन अउ लिख डरेंव “काग के भाग बड़े सजनी” नांव के एक ठन किताब.

(परमानंद वर्मा वरिष्ठ पत्रकार हैं, आलेख में लिखे विचार उनके निजी हैं.)

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